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–कबड्डी का खिलाड़ी 2

Posted On 5 Feb, 2017 में

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चेहरे पर कपटी मुस्कान लाते हुए साहब महाबली की ओर मुख़ातिब होते हुए बोले- भाई साहब कल शाम से हम साथ है फिर भी हमारा परिचय नहीं हुआ। अरे ! तो कर लो इन्ट्रोडकशन भाई थारे को कौण रोक्के हैं। महाबली अपनी स्वच्छन्द शेली में हंसते हुए बोला- ’’मेरा नाम कृष्णकान्त है, मैं कानपुर का रहने वाला हूँ, उ0प्र0 में 2012 बैच का पी0सी0एस0 अधिकारी हूँ, लखनऊ के कृषि एवं खाद्य कार्यालय में महाप्रबन्धक के पद पर कार्यरत हूँ’’। परिचय देते-देते साहब की आवाज और आॅखों में अहंकार का दर्प स्पष्ट झलक रहा था। जैसे वो महाबली को उसकी औकात बता रहे हो। ’’थारी तो कमाई भी बहुत होगी’’ महाबली ने बीच में ही टोकते हुए कहा। साहब बड़प्पन की हंसी हंसते हुए ! ’’अरे नहीं सरकारी अधिकारियों का बेसिक पे 15600+5400 होता है कुल मिलाकर 55-60 हजार वेतन पड़ जाता है ऊपर से सुविधाएं बहुत मिलती है समय के साथ basic और gradepay प्रमोशन पर बढ़ जाता है यहां 5400 grade होता है और 15600 payband वो महाबली को ऐसे समझा रहे थे जैसे महाबली बिल्कुल अनपढ़ काहिल हो। रे ! मणे पता है 5400 gradepay होवे और 15600 payband मारा भी बेसिक 30000 है gradepay भी 14000 है ये सुनकर साहब की आंखे फट गयी। उनका दांव उल्टा पड़ गया था सोचने लगे ये गंवार बेवकूफ है ऐसे ही जो मुॅह में आया बक रहा है। फिर भी साहब ने पूछ ही लिया कि आप किस पद पर है ’’अरे अधिकारी महोदय जी मैं भी हरियाणा पुलिस में डी स पी हूँ थारी तरह मुझे इतना किताबी ज्ञान तो ना है मैं तो स्पोटर्स कोटे से हूँ, महाबली ने प्रत्यउत्तर दिया ’’ मैं एक अंतराट्रीय कबडडी खिलाड़ी हूँ कोई पदक जीतने पर मारी बेसिक सरकार ढेड़ बढा दे है कई देशो में जाके पदक जीते है मैंने। साहब ने टोकते हुए तब तो आपकी ग्रोस भी बहुत बनती होगी’’ साहब के चे हरे पर आचर्य के भाव थे। ’’रे भाई! इतना हिसाब-किताब लगाड़े का टेम न मिलता मणे मैं प्रो. कबडडी लीग में 2 करोड का बिका हूँ ये काम तो म्हारा मैनेजर देखे है’’ ये सुन तो जैसे साहब अर्श से सीधे फ़र्श पर गिर गए थे वो भी सर के बल, उनका सारा पोरूष सारा बल समस्त अस्त्र-शस्त्र उस घटोत्कच रूपी खिलाड़ी के सामने व्यर्थ हो गए थे।
इसी दौरान मेमसाहब ने घर की लायी आलू- कचोड़ी भी निकाल ली बूढे अंकल को देने के बाद महाबली की तरफ हाथ बढ़ाते हुए ’’ लो भईया कचोड़ी खा लो’’ बहुत-बहुत धन्यवाद बहन जी, महाबली ने कचोड़ी पकडते हुए कहा।
इतना सब कुछ देख सुनने के बाद साहब आज पहली बार खुद से इतने खफा थे। अपनी संकीर्ण सोच औरं शंकालु प्रवृत्ति पर आज वो बहुत शर्मिदा थे। ऐसा लग रहा था जैसे वो पश्यताप की अग्नि में जलते हुए अपना सर पीट रहे हो।
जल्द ही महाबली का गन्तव्य स्टेशन भी आ गया वो सबसे विदा लेकर उतर गया पर जाते-जाते वो अनजाने में ही साहब को जीवन का सच बता गया था जो पाठ साहब हजार किताब पढ़ कर भी न सीख पाए थे। इस घटना से सीख गए थे ’’जीवन का आनन्द जिदंगी को संकीर्ण और तंग दायरे के झरोखों से देखने में नहीं बल्कि खुली, वृहद सरल सोच से जीने में है। ये रहस्य अब वो समझ चुके थे।
इस यात्रा के बाद साहब बहुत बदल गए थे सुना है अब वो किसी कर्मचारी को परेशान भी नहीं करते थे …………………… ।

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