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भूखमरी और आर्थिक विकास

Posted On: 19 Aug, 2012 Others में

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जेठ के महीने की चिलचिलाती धूप भी आज उसके जर्जर एवम रोगिण देह को नहीं रोक पा रहे थे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उसके हाथ बिजली की गति से काम कर रहे हो उसकी कुल्हाड़ी वृक्ष पर ऐसे प्रहार कर रही थी जैसे ये प्रहार वो अपने दुःख और कष्टों पर कर रही हो तभी ऐसे लगा जैसे अपने बच्चे की जिंदगी बचाने के लिए दो दिन भूखी माँ के लिए स्वयं वृक्ष को दया आ गयी और उसने अपनी शाखाए खुद ही गिरा दी जल्द ही डोडा कुछ लकड़िय इकट्ठा कर उनको बेच कर खाना और दवाइयां लेकर अपने घर पहुचती है जहाँ उसका तीन साल का बेटा जिंदगी और मौत से अपनी आखरी लड़ाई लड़ रहा था |
पति के आत्महत्या करने के बाद डोडा के जीवन का एक मात्र सहारा भी आज उससे अन्तिम विदाई लेने के लिए तेयार था बेटा को मृत्यु शैया पर देखकर डोडा तो मानो जड़ मूर्ति हो गयी आज उसके लिए जीवन निरुद्देश्य हो गया था अब उसके लिए संसार में कुछ भी नहीं बचा था उसके ह्रदय की पीड़ा की अभिव्यक्ति आज संसार की किसी भी भाषा सामर्थ्य से परे की बात हो गयी थी उसके कंठ में कोई स्वर ऐसे ना थे जो उसके रुदन विलाप को प्रकट कर सके डोडा आज मौन हो गयी | ये सब पड़कर आपको लग रहा होगा की ये सब किसी फिल्म का भावात्मक द्रश्य या किसी उपन्यास का अंश है किन्तु आप को ये जानकार हेरानी होगी की ये महाराष्ट्र के विदर्भ प्रान्त में एक किसान के घर की सच्ची कहानी है जिसने साहूकारों के क़र्ज़ के बोझ एवेम भूखमरी के चलते आत्महत्या कर ली थी और उसकी आत्महत्या के एक महीने के अंदर ही उसके पुत्र मधुसूदन की भूखमरी एवम बिमारी से मौत हो गयी जिसके सदमे से उसकी पत्नी डोडा भी इस दुनिया से चल बसी पर इस कहानी में कोई बेचने लायक मसाला ना होने के कारण ये भारतीय लोकतंत्र के चोथे स्तंभ मीडिया की नज़र में ना आई ऐसे ना जाने कितने लोग है जो भूखमरी एवं निर्धनता से मर रहे है या आत्महत्या करने के लिए मजबूर है अगर हम uno की विश्व भूख सुचकांक (GHI) की रिपोर्ट पर निगाह डाले तो पूरे भारत में भूख से मरने वाले लोगों की संख्या विश्व में भूख से मरने वाले लोगों की एक तिहाई है लेकिन फिर भी मानवता के माथे पर कलंक रूपी इस समस्या की ओर ना किसी का ध्यान जाता है और ना ही ये खबरे मीडिया की सुर्खिया बनती है जरा कल्पना कीजिये उस पल को जब आपको तेज भूख लगी हो और आपको खाना ना मिले उस असमर्थता को महसूस करे जो भूख से तडपते और मरते लोगों को होती होगी जब जीवन भूख के आगे ही नहीं मृत्यु के सामने भी समर्पण कर देता है ऐसी मौते अपने पीछे वर्तमान व्यवस्था पर कई प्रश्न छोड़ जाती है क्योंकि जहा देश में भूख से मौते हो रही है वही सरकारी गोदामो में 66 लाख टन अनाज सड़ रहा है या चूहों द्वारा खाया जा रहा है जिसको सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार ने आर्थिक विवशता के चलते गरीबो में मुफ्त बाटने से इंकार कर दिया मैं ये जानना चाहता हु कि ऐसी कोन सी आर्थिक विवशता है जिसके चलते सरकार लोगों को भूखा तो मरने दे सकती है पर मुफ्त में अनाज नहीं बाट सकती नवउदारवादी दवाब के चलते राशन प्रर्णीली को तो 1997 में ही लगभग बंद ही कर दिया गया तो क्या देश के आर्थिक विकास के लिए भूखे लोगों कि बलि आवश्यक हो गयी है भूख से बड़ा कोई अपमान नहीं है लाभों के छन छन कर नीचे तक पहुचने के सिदान्तो से गरीबी व भूख की न्यायसंगत आकांशाओ का समाधान नहीं हो सकता है, क्यों आर्थिक समानता का सपना केवल राष्ट्र पति एव म प्रधानमंत्री के भाषणों में ही सुनने को मिलता है इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जायगा की इसका लोकतन्त्र 65 वर्ष का तो हो गया है पर आज तक कोई चुनाव ऐसा नहीं हुआ जिसमे राजनीतिक पार्टीयों ने देश की आर्थिक नीतियों को चुनावी मुद्दा बनाया हो आज भी हम अपना चुनाव मंदिर एव म मस्जिदों,जाति धर्मो के नाम पर लड़ते है अर्थशास्त्र के नाम पर जनता केवल संसेक्स ,मह्गाई दर ,SLR,GDP तक ही सीमित होकर रह जाती है हम ये नहीं सोचते की ये ऐसा कोन सा आर्थिक तंत्र है जिसमे आम आदमी के बैंकों में जमा बचत के पैसे को दुगना होने में 8 साल लगते है जबकि रिलायंस ,टाटा और अन्य ओद्योगिक घरानों की कुल सम्पति हर तीसरे साल दुगनी हो जाती है जहा अपने पसीने से अन्न पैदा करने किसान आत्महत्या को मजबूर है जबकि शेयर मार्केट व वायदा बाज़ार के दलाल बिना श्रम के करोड़ पति हो रहे है इस आर्थिक विषमता ने समाज के मूल दाचा को छिन्न भिन्न कर दिया है इस प्रथ्वी पर ही समान्तर में मानो कई दुनिया चल रही है एक वो लोग है जो अपने लिए शोचालयों में भी लाखो रुपये खर्च कर रहे है एक वो लोग भी है जो २८ रुपये होने पर भी गरीब नहीं है ये कोन सा अर्थशास्त्र है जिसका समाजशास्त्र से कोई सरोकार नहीं है |प्रकति ने सबको जीने का बराबर अधिकार दिया है और उसके संसाधनों पर भी सबका बराबर अधिकार है एक गुलाब के फूल की सुंदरता किसी की निजी मिल्कियत नहीं हो सकती उसी तरह प्रकति के संसाधनों पर मनुष्यों का समान अधिकार है फिर ये कैसे संभव हुआ की डोडा जैसे परिवार भूख से मृत्यु आलिगंन कर रहे है और कुछ परिवारों की पार्टियों में सेकडों किलो खाना झूठन में फेका जा रहा हो ,इसका कारण है पूजीवादी अर्थव्यवस्था पूजी के केंद्रीकरण के कारण ताकत केवल कुछ गिने चुने लोगों के हाथ में ही रहती है जो समाज को अपने हिसाब से चलाते है सरकारे भी उन्ही का सरक्षण करती है |
इन चंद मुठी भर लोगों के हितों के कारण समाज में एक आपाधापी का माहोल बना दिया गया है जहा पूंजी के केम्द्रीकरण के चलते देश में बेरोजगारों की फोज खड़ी हो गयी है तेजी से चलते निजीकरण ने शिक्षा और चिकित्सा जैसे शेत्रो को भी लील लिया है मुनाफा और सिर्फ मुनाफा का संकल्प लिए ओद्योगिक घरानों द्वारा सरकार की मदद से देश के सार्वजनिक उपक्रमों की सरेआम लूटपाट कर रहे है २G ,३G,कोयला ब्लाक आवंटन इसके कुछ छोटे उदाहरण है इन सब ने आज देश में एक मौन आर्थिक गुलामी जैसे हालात पैदा कर दिए है जिसका समाज पर असर सहज ही देखा जा सकता है आज हर कोई एक असुरक्षा केवातावरण में जी रहा है महगाई,भ्रस्टाचार,समाप्रदायिकता,शत्रिये संघर्ष जैसे समाजिक बुराईयो ने
आज देश को खोकला कर दिया है इस अराजकता ने मानव की सोच को बेहद संक्रिड़ ,स्वार्थपरक बना दिया है हर कोई खुद की दुनिया में ही व्यस्त हो चला है सहअस्तित्व  भावना समाप्त हो रही है आज हम इतने असवदेंशील हो गए है की अपने आस पास कोई दुर्घटना एवम किसी की मृत्यु हो जाने पर भी लोग उसे अनदेखा कर अपने काम पर चले जाते है कोई भी मदद को नहीं आता है जबकि यदि हम जानवरों के व्यव्हार का अध्ययन करे तो हम पायेगे की जानवर भी अपने साथी या हम नस्ल की संकट में मदद करता है तो क्या हम जानवरों से भी बदतर स्थिति  में पहुच गए है जीव विज्ञानं कहता है की मनुष्य को जानवर से आदमी बनने में सेकडों वर्ष लग गए फिर कैसे हम इतनी जल्दी आदमी से जानवर बन सकते है ?
आइए हम अपने समाज को जंगल होने से बचाए ! हमारे इतिहास ने अनेको क़ुरबानी देकर हमे यहाँ तक पहुचाया है अब ये आप पर निर्भर है की आप अपने आने वाली पीड़ी को वसीयत में आलिशान मकान ,लंबा चोड़ा बैंक बैलेंस देकर जाना चाहेंगे या एक अच्छा समाज जहा जानवर नहीं बल्कि इंसान रहते हो जहा कोई भूख से कोई मासूम ना मर रहा हो , जहा बिना इलाज के किसी को दुनिया ना छोडनी पड़े जहा हर किसी को जीवन की बुनयादी सुविधा मिले |

हम सजायेगे सवारेंगे निखारेंगे तुझे ,
हर मिटे नक्श को उभार,फिर से चमकायेगे तुझे
डार पे चड फिर से पुकारेंगे तुझे
राहे अग्यार की देखे ये भला ठोड नहीं
हम भगत सिंह के साथी है कोई और नहीं

(v.k.azad)



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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashishgonda के द्वारा
October 7, 2012

मान्यवर! सादर……. आज पहली बार आपको पढ़ रहा हूँ. आप जैसे नवयुवको को देश-दुनियां की चिंता है ये बड़े हर्ष की बात है. आपने वर्तमान भारत का सीधा शब्दों में चित्रण किया है. आपकी रचना दैनिक-जागरण में प्रकाशित की गई इसके लिए आपको बधाई और जागरण को आभार…………. कभी मेरे लिए भी समय निकाले…अपना आशीष प्रदान करें. http://www.ashishgonda.jagranjunction.com/

    vijay के द्वारा
    October 14, 2012

    ब्लॉग पर पधारने के आभार

Lahar के द्वारा
September 7, 2012

प्रिय विजय जी सप्रेम नमस्कार कटु सत्य कहा आपने |

    vijay के द्वारा
    September 8, 2012

    नमस्कार मित्रवर सहमती के लिए आभार

D33P के द्वारा
September 6, 2012

विजय जी नमस्कार…सच में लगता है जंगल राज हो गया है सरे राह बलात्कार ,खून,अपहरण ,आत्महत्या ,भुखमरी आये दिन यही सब तो देख सुन रहे है .सरकार को जनता से कोई सरोकार नहीं सरकार कागजो में योजनाये बनाती है अपनी जेबे भरने के लिए न की जनता को राहत देने के लिए समितिया बनती है भंग होती है ,सरकारी खेल चलता रहता है !दुर्घटना हो जाने पर भी लोग तो उसे अनदेखा कर अपने काम पर चले जाते है कोई मदद को आगे आना चाहे तो पुलिस के रवैये से पीछे हट जाते है और रही सही कसर डाक्टर पूरी कर देते है! सही में हम जानवरों से भी गए गुजरे हो गए है ! देश के वर्तमान हालात पर व्यंग करती उम्दा प्रस्तुति

    vijay के द्वारा
    September 7, 2012

    पता नहीं हमे कब राहत मिलेंगी दूर तक कोई समाधान नज़र नहीं आता ,कितना लिख लो कितना बोल लो कुछ परिवर्तन नहीं हो रहा है

nishamittal के द्वारा
September 1, 2012

आँखें खोलने वाली पोस्ट विजय जी,देश की एक झकझोरने वाली समस्या परन्तु राजनीतिज्ञ और किसी भी नेता को या तो ये समस्या दिखती नहीं और यदि कभी भूले भटके dikh भी गयी तो राजनैतिक लाभ के लिए.

    vijay के द्वारा
    September 7, 2012

    आदरणीय माता जी नमस्ते ब्लॉग पर पधारने के लिए धन्यवाद ,मैने गुलामी का दोर तो नहीं देखा पर लगता है कुछ कुछ वर्तमान जैसे ही हालात होंगे

seemakanwal के द्वारा
August 31, 2012

मैं आप से पूरे तरह सहमत हूँ .मानव होने के नाते मानवता हमारा पहला धरम होना चाहिए .

    vijay के द्वारा
    September 7, 2012

    आपकी सहमति के लिए धन्यवाद 

dineshaastik के द्वारा
August 26, 2012

विजय जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति. दैनिक जागरण पत्र में रचना के स्थान पाने के लिये बधाई….

    vijay के द्वारा
    August 26, 2012

    आपकी प्यार व स्नेह के लिए बहुत आभार

JJ Blog के द्वारा
August 23, 2012

आदरणीय विजय जी, उत्कृष्ट श्रेणी की होने के कारण आपकी रचना ”यह कैसा विकास” के नाम से दैनिक जागरण के संपादकीय पृष्ठ पर दिनांक  23 अगस्त 2012 को प्रकाशित हुई है.  जिसके लिए आपको हार्दिक बधाई. धन्यवाद जागरण जंक्शन परिवार

    vijay के द्वारा
    August 25, 2012

    ये सम्मान देने के लिए आपका आभार ,धन्यवाद !

yogi sarswat के द्वारा
August 22, 2012

म सजायेगे सवारेंगे निखारेंगे तुझे , हर मिटे नक्श को उभार,फिर से चमकयेगे तुझे डार पे चड फिर से पुकारेंगे तुझे राहे अग्यार की देखे ये भला ठोड नहीं हम भगत सिंह के साथी है कोई और नहीं बहुत भयावह तस्वीर है ये ! लेकिन हमारे मंत्रियों को इनका दुःख दिखाई नहीं देता , उन्हें इसमें ख़ुशी मिलती है ! विषय परक , संवेदनशील आलेख

    vijay के द्वारा
    August 22, 2012

    आदरणीय योगी जी नमस्ते आपके सहयोग के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ,लेकिन सामजिक परिवर्तन बहुत धीमी और सतत प्रक्रिया है एक दिन ऐसा आएगा जब हम आप में से कोई एक संसद में होगा और स्थिति सुधारेगा ऐसा मुझे यकीन ही नहीं पूरा विश्वास है |

Chandan rai के द्वारा
August 22, 2012

मित्रवर , पूरी इमानदारी से कह रहा हूँ ,आपके इस पहले लेख के पाठन से ही पता लगता है की आप एक बेहतरीन लेखक है ! आपका यह आलेख मंच पर चुनिन्दा बेहतरीन लेखों में से एक है ! मेरा हार्दिक अभिनन्दन स्वीकारे !

    vijay के द्वारा
    August 22, 2012

    चन्दन जी आपकी उत्सावर्धन भरी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ,लेकिन यहाँ जागरण ब्लॉग पर आप जैसे नोजवानों के लेख पड़कर मुझे श्री भारतेन्दु हरिश्चंद जी के संघर्ष की याद आती है जो उन्होंने हिन्दी भाषा को स्थापित करने के लिए किया था अगर कही स्वर्ग से आज वो आपके ,योगी जी के ,या आदरणीय निशा जी,या दिनेश जी के लेख पड़ते होगे तो निश्चय ही उन्हें लगता होगा की इतिहास में उनके द्वारा किया गया संघर्ष बेकार नहीं गया |


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