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नारी तेरी यही कहानी

Posted On: 24 Jul, 2012 में

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नारी तेरी यही कहानी
कभी अपनी गुड़ियों के लिए चुन्निया इक्कट्ठी करती,कभी अपनी सहेलियों के साथ पाबिटा
खेलती बाबा ने मुझे कब स्कुल में भर्ती करा दिया मुझे पता ही नहीं चला | रोज मेरी माँ
स्कुल जाने के लिए मुझे तैयार करती मेरी चोटी बनाती अक्सर चोटियो के रि-वनो में फसा
मेरा दिमाग कभी इस बात की ओर नहीं गया कि क्यों मेरे से दो साल बड़े मेरे भाई को
ज्यादा फ़ीस वाले अंग्रेजी मीडियम स्कुल पदाया गया और मुझको सरकारी विद्यालय में
चार साल कि में तो अक्सर स्कुल में भी गुड़िया गुड्डो कि ही बाते करती रहती थी |एक
दिन बाबूजी भईया और मुझे नए कपड़े व मिठाई दिलवा के लाए मुझे बताया गया कि अगले
दिन रक्षा बन्धन है मैं भाई की कलाई पर राखी बाधुगी और इसके बदले में मेरा भाई मेरी
रक्षा करेगा मुझे पहली बार अहसास हुआ कि मैं निर्बल हु इसलिए मेरे भाई को मेरी रक्षा
करनी पड़ेगी,मध्यमवर्गीय हिन्दू परिवार में होने के कारण मुझे रामायण,महाभारत आदि ग्रंथो
का अध्ययन कराया गया मेरी दादी मुझे सती सावत्री ,सती अनुसुया कि कहानी सुनाती थी मेरा बाल
मन भी ये कहानी सुनकर कल्पना करता कि मैं भी बड़े होकर सती सावत्री बनूगी |
धीरे धीरे समय अपना असर दिखाने लगा मैंने जीवन के सोलाह वर्ष पूरे कर लिए इसी
के साथ मेरे ऊपर घरवालो की बंदिशे भी शुरू हो गयी मेरे पहनने के कपड़े से लेकर मेरी
सहलियों तक हर चीज पर मेरे घरवालो की टोकाटाकी शुरू हो गयी जबकि मेरा भाई जैसे
चाहे वैसे रहता उस पर कोई वंदिशे नहीं थी वो अपने साथ पदने वाली लड्कियों को घर पर
ले भी आता तो मेरी दादी ,मम्मी बहुत खुश होती और अगर मैं अपने बचपन में साथ खेलेने
वाले लड़कों से बोल भी लेती तो मुझे डाट पड़ जाती थी मैं अब घरवालो के चिंता का विषय हो
गयी अक्सर मैंने माँ को बाबूजी के साथ मेरी शादी के विषय में चिंतित होते देखा \
बाहर का समाज भी अब मेरे लिए बिलकुल बदल गया था अक्सर मैंने मोहल्ले व आस
पास के पुरुषों की आखो को अपने शरीर को भेदता हुआ पाया मुझे लगता था कि जैसे
मै एक हाड् मांस कि चीज हू मेरे मन की भावनाये समझने वाला कोई नहीं था ना मेरे घर
पर ना बाहर, मुझे इस समाजिक व्यवस्था से चिड होने लगी  है मैं यह सोचती हू कि मैंने
लड़की होकर ऐसा क्या गुनाह कर दिया है जिसकी अप्रत्यक्ष रूप से घर पर या कभी समाज में
मुझे सजा दी जाती है या हम भारतीय लोगों का इतिहास ही कुछ ऐसा है जिसमे महाभारत में
द्रोपदी को एक वस्तु समझकर जुए में हार दिया जाता है और फिर भी युधिष्ठिर धर्मराज कहलाते
है ये कोन सा धर्म था कि अपनी पत्नी को ही वस्तु समझकर जुए में दाव पर लगा दे,और वो
कोन से मर्यादा पुरषोत्तम राम थे जिसने एक धोबी के कहने पर अपनी गर्भवती पत्नी को जंगल
में छोड़ दिया था क्यों सतयुग में भी सीता को अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा था ? वो चाहती तो
भोग बिलास से महल में रह सकती थी क्यों वो राम के साथ वनवास काटने गयी थी ? अगर
हमारे इश्वर भी स्त्री विरोधी मानसिकता के थे तो मैं ऐसे इश्वर का अस्तित्व स्वीकार नहीं करुंगी
युगों युगों से औरत मर्दों के लिए अपने सुखो का त्याग करती रही है ऐसा क्यों है ? क्यों सती सावित्री ही
यमराज से लड़कर अपने पति के प्राण वापस लायी क्यों नहीं आजतक कोई पति अपनी पत्नी के प्राण
यमराज से वापस लाया ? करवाचोथ ,रक्षाबंधन, अहोई अष्टमी,ये सब त्यौहार रूपी परम्पराए भी औरतो का शोषण
का साधन है मर्दों के लिए कोई करवाचोथ क्यों नहीं है हमारा इतिहास ही कुछ ऐसा है कभी हम पति
कि मुत्यु पर उसकी चिता के साथ जिंदा जला दिए गए तो कभी पति के युद्ध हारने पर शत्रुयो के
हरम की शोभा बन गए अगर ये रीति रिवाज ये परम्पराए हमें अपना अस्तित्व नहीं पाने देगे तो हमें
ऐसे इतिहास को बदलने की जरुरत है ये सारा इतिहास ,महाकाव्य,पुरातन ग्रन्थ, किवदंतियां उस पुरुष
प्रुभुत्व समाजिक तंत्र को प्राणवायु देने के लिए है जिसके वजह से हम स्त्रियों का शोषण करना आसान
हो जाता है हमें इतिहास की दुहाई देकर चुप करा दिया जाता है पर अब हम चुप नहीं बैठेंगे ,इस दुनिया
में कभी रंग भेद पर क्रांति तो कभी सर्वहारा और पूंजीपतियों का संघर्ष हो चुका है पर स्त्रियों के अधिकारों के
लिए केवल सुधार होता है क्यों कोई क्रांति नहीं होती ? आप सोच रहे होंगे की में कोन हू आइए में आप
से अपना परिचय करा देती हू में वो हर लड़की हू जो कभी गोहाटी की सड़को पर सरेआम नोंची जाती है, मै
वो भी हू जिसके मुह पर कुछ सिरफिरे अपनी मंशा पूरी ना होने पर तेजाब फ़ेक देते है
मैं वो भी हू, जो कभी अपने ससुर के हाथो रेप कर दी जाती हू मैं वो बच्ची भी हू जो हवस का शिकार बन
जाती है हम कब तक ऐसे चुप रहेंगे कब तक दूसरे की गलती के लिए खुद को दोषी ठहराते रहेंगे |
आओ हम मिलकर संघर्ष करेंगे परिवर्तन के लिए ,क्रांति के लिए अपनी आने वाली पीड़ीयो को एक नया
इतिहास देने के लि

नारी तेरी यही कहानी

कभी अपनी गुड़ियों के लिए चुन्निया इक्कट्ठी करती,कभी अपनी सहेलियों के साथ पाबिटा

खेलती बाबा ने मुझे कब स्कुल में भर्ती करा दिया मुझे पता ही नहीं चला | रोज मेरी माँ

स्कुल जाने के लिए मुझे तैयार करती मेरी चोटी बनाती अक्सर चोटियो के रि-वनो में फसा

मेरा दिमाग कभी इस बात की ओर नहीं गया कि क्यों मेरे से दो साल बड़े मेरे भाई को

ज्यादा फ़ीस वाले अंग्रेजी मीडियम स्कुल पदाया गया और मुझको सरकारी विद्यालय में

चार साल कि में तो अक्सर स्कुल में भी गुड़िया गुड्डो कि ही बाते करती रहती थी |एक

दिन बाबूजी भईया और मुझे नए कपड़े व मिठाई दिलवा के लाए मुझे बताया गया कि अगले

दिन रक्षा बन्धन है मैं भाई की कलाई पर राखी बाधुगी और इसके बदले में मेरा भाई मेरी

रक्षा करेगा मुझे पहली बार अहसास हुआ कि मैं निर्बल हु इसलिए मेरे भाई को मेरी रक्षा

करनी पड़ेगी,मध्यमवर्गीय हिन्दू परिवार में होने के कारण मुझे रामायण,महाभारत आदि ग्रंथो

का अध्ययन कराया गया मेरी दादी मुझे सती सावत्री ,सती अनुसुया कि कहानी सुनाती थी मेरा बाल

मन भी ये कहानी सुनकर कल्पना करता कि मैं भी बड़े होकर सती सावत्री बनूगी |

धीरे धीरे समय अपना असर दिखाने लगा मैंने जीवन के सोलाह वर्ष पूरे कर लिए इसी

के साथ मेरे ऊपर घरवालो की बंदिशे भी शुरू हो गयी मेरे पहनने के कपड़े से लेकर मेरी

सहलियों तक हर चीज पर मेरे घरवालो की टोकाटाकी शुरू हो गयी जबकि मेरा भाई जैसे

चाहे वैसे रहता उस पर कोई वंदिशे नहीं थी वो अपने साथ पदने वाली लड्कियों को घर पर

ले भी आता तो मेरी दादी ,मम्मी बहुत खुश होती और अगर मैं अपने बचपन में साथ खेलेने

वाले लड़कों से बोल भी लेती तो मुझे डाट पड़ जाती थी मैं अब घरवालो के चिंता का विषय हो

गयी अक्सर मैंने माँ को बाबूजी के साथ मेरी शादी के विषय में चिंतित होते देखा |

बाहर का समाज भी अब मेरे लिए बिलकुल बदल गया था अक्सर मैंने मोहल्ले व आस

पास के पुरुषों की आखो को अपने शरीर को भेदता हुआ पाया मुझे लगता था कि जैसे

मै एक हाड् मांस कि चीज हू मेरे मन की भावनाये समझने वाला कोई नहीं था ना मेरे घर

पर ना बाहर, मुझे इस समाजिक व्यवस्था से चिड होने लगी  है मैं यह सोचती हू कि मैंने

लड़की होकर ऐसा क्या गुनाह कर दिया है जिसकी अप्रत्यक्ष रूप से घर पर या कभी समाज में

मुझे सजा दी जाती है या हम भारतीय लोगों का इतिहास ही कुछ ऐसा है जिसमे महाभारत में

द्रोपदी को एक वस्तु समझकर जुए में हार दिया जाता है और फिर भी युधिष्ठिर धर्मराज कहलाते

है ये कौन सा धर्म था कि अपनी पत्नी को ही वस्तु समझकर जुए में दाव पर लगा दे,और वो

कौन से मर्यादा पुरषोत्तम राम थे जिसने एक धोबी के कहने पर अपनी गर्भवती पत्नी को जंगल

में छोड़ दिया था क्यों सतयुग में भी सीता को अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा था ? वो चाहती तो

भोग बिलास से महल में रह सकती थी क्यों वो राम के साथ वनवास काटने गयी थी ? अगर

हमारे इश्वर भी स्त्री विरोधी मानसिकता के थे तो मैं ऐसे इश्वर का अस्तित्व स्वीकार नहीं करुंगी |

युगों युगों से औरत मर्दों के लिए अपने सुखो का त्याग करती रही है ऐसा क्यों है ? क्यों सती सावित्री ही

यमराज से लड़कर अपने पति के प्राण वापस लायी क्यों नहीं आजतक कोई पति अपनी पत्नी के प्राण

यमराज से वापस लाया ? करवाचौथ ,रक्षाबंधन, अहोई अष्टमी,ये सब त्यौहार रूपी परम्पराए भी औरतो का शोषण

का साधन है मर्दों के लिए कोई करवाचौथ क्यों नहीं है हमारा इतिहास ही कुछ ऐसा है कभी हम पति

कि मुत्यु पर उसकी चिता के साथ जिंदा जला दिए गए तो कभी पति के युद्ध हारने पर शत्रुयो के

हरम की शोभा बन गए अगर ये रीति रिवाज ये परम्पराए हमें अपना अस्तित्व नहीं पाने देगे तो हमें

ऐसे इतिहास को बदलने की जरुरत है ये सारा इतिहास ,महाकाव्य,पुरातन ग्रन्थ, किवदंतियां उस पुरुष

प्रभुत्व’ समाजिक तंत्र को प्राणवायु देने के लिए है जिसके वजह से हम स्त्रियों का शोषण करना आसान

हो जाता है हमें इतिहास की दुहाई देकर चुप करा दिया जाता है पर अब हम चुप नहीं बैठेंगे ,इस दुनिया

में कभी रंग भेद पर क्रांति तो कभी सर्वहारा और पूंजीपतियों का संघर्ष हो चुका है पर स्त्रियों के अधिकारों के

लिए केवल सुधार होता है क्यों कोई क्रांति नहीं होती ? आप सोच रहे होंगे की में कौन हू आइए में आप

से अपना परिचय करा देती हू मैं  वो हर लड़की हू जो कभी गोहाटी की सड़को पर सरेआम नोंची जाती है, मै

वो भी हू जिसके मुह पर कुछ सिरफिरे अपनी मंशा पूरी ना होने पर तेजाब फ़ेक देते है

मैं वो भी हू, जो कभी अपने ससुर के हाथो रेप कर दी जाती हू मैं वो बच्ची भी हू जो हवस का शिकार बन

जाती है हम कब तक ऐसे चुप रहेंगे कब तक दूसरे की गलती के लिए खुद को दोषी ठहराते रहेंगे |

आओ हम मिलकर संघर्ष करेंगे परिवर्तन के लिए ,क्रांति के लिए अपनी आने वाली पीड़ीयो को एक नया

इतिहास देने के लिए !

(v.k.azad)


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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

seemakanwal के द्वारा
August 6, 2012

आप ने महिलाओं के दुःख को समझा .आभार .

D33P के द्वारा
July 28, 2012

विजय जी नमस्कार ……सच में आपने एक पुरुष होते हुए एक स्त्री की पीड़ा को जिस तरह शब्द दिए है वास्तव में सराहनीय है …..आज के हालात ,समाज पर व्यंग करती बहुत खूबसूरत रचना .बधाई

bharodiya के द्वारा
July 25, 2012

रंगभेद या आपने जीतने भी भेद बताये वो रहे या जाये भाडमें प्रक्रुति को कोई फरक नही पडता । लेकिन आप नया भेद पैदा करने की कोशीश कर रहे प्लस और माईनस का, ईस भेद से प्रक्रुति में नवसर्जन ही रुक जाता है । प्लस और माईनस के संयोग से ही दुनिया चलती है । उनका वियोग करा दोगे तो ईन के मरने के बाद क्या बचेगा ।

    vijay के द्वारा
    July 26, 2012

    मान्यवर मेरी ये समझ में नहीं आ रहा लेख का नवसर्जन से क्या सम्बन्ध है स्पष्ट करे

    bharodiya के द्वारा
    July 27, 2012

    दुनिया भर में नर और नारी को एक दुसरे से भडकानी की साजीश चल रही है । संयुक कुटुम्ब प्रथा में नर नारी को अलग करना संभव नही था । बडे बुजुर्ग समजा ले ते थे । आजादी की ऐसी हवा चलाई की संयुक्त कुटुंब टुट गये । आज छोटा कुटुंब बचा है मिया बीबी का । वो भी खटक रहा है । उस में भी दरार डालो । ईस के लिए जानबुज कर रिती रिवाजो को कोसा जाता है । लाखों साल के बाद आज नारी के स्वमान को जगाया जाता है । नारी को कहा जाता है तू पराई है, खिलौना है । अभी तो साफ नही बोलते, लेकिन एक दिन आयेगा जब कहा जायेगा कोइ नर तेरे प्राईवेट पार्ट को कैसे छु सकता है, वो तेरा अपमान है । सरकार ने खूद आज एक बहुत बडी दरार डाली है । तलाक तो बहुत आसान कर दिया था, आज ईस में ऐसी कलम डाली गई की आदमी शादी करने से पहले हजार बार सोचे । कहीं लडकी शादी के दुसरे दिन भाग तो नही जाएगी । और तलाक मांग ले तो आधी जायदाद उसे देनी पडेगी । लडके ही गुंडे होते हैं ऐसा नही है । लडका भी सोचमें पड जाता है ऐसी कौन सी लडकी ढुंढु जो गुंडी न हो और तलाक न मांगे और जायदाद खतरे में ना पडे । भाषा का भेद, धर्म का भेद, जाति का भेद अब नर नारी का भेद । सब को लडाओ । नवसर्जन ईस नर और नारी के भेद के साथ संबंध रखता है । नर नारी दूर होंगे तो बच्चे कैसे पैदा होंगे । वासना की पिडा में बिनबाप बच्चा पैदा कर लिया तो होगा क्या । वासना मिटाते समय भी आत्मसंमान तो जाता ही है ।

dineshaastik के द्वारा
July 25, 2012

विजय जी,नारी की पीड़ा की स्याही से लिखी गई, तीखा प्रहार करती तथा सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाती हुई प्रस्तुति…..

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    July 25, 2012

    मैं भी कृष्ण को महान मानता हूँ किन्तु उनके कुछ कृत्य मानवीय दृष्टि से क्षम्य नही ं हैं। हो सकता है कि मेरे विचारों से कोई सहमत न हो किन्तु मैं तार्किक कारणों से अपने विचारों पर अटल हूँ। दिनेश “आस्तिक” जी ….. आपने अपनी प्रतिकिर्या में जिन तार्किक कारण का उल्लेख किया है मैं तुच्छ प्राणी उनकी विस्तारपूर्वक व्याख्या जानना चाहता हूँ ताकि मेरा ज्ञानवर्धन हो सके और मैं अज्ञानी आपसे कुछ ज्ञान पा सकू ….. किरपा करके मेरा मार्गदर्शन कीजिये ….. उम्मीद है की आप मुझको निराश नहीं करेंगे ….. :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D (हैरानी होती है की एक पुरुष होकर आपने नारी के भावो को इतने बेहतरीन तरीके से किस प्रकार प्रस्तुत किया है )

    dineshaastik के द्वारा
    July 26, 2012

    मान्यवर जिस विषय के संबंध में आलेख हो, उसी संबंध में प्रतिक्रिया दे। इस संबंध में आप मेरे आलेख पढ़े आप मेरे आलेख पढ़े, आपकी निश्चित रूप से काँग्रेस विचारधारा से ग्रसित हैं। यह एक गंभीर बीमारी है। भारत के पतन का कारण भी यही है। चूँकि काँग्रेसी संस्कृति में स्वयं की(सोनिया जी आदि की) आलोचना स्वीकृत नहीं हैमैंने आपके काँग्रेस संबंधी आलेख की आलोचना की थी संभवतः आपको वह आलोचना स्वीकृत नहीं हुई। अतः आप इस तरह की अनीति अपना रहे हैं। मै न तो आपका मार्गदर्शन करने में समर्थ हूँ और न ही बाध्य हूँ। आप स्यवं स्वयं भू गुरू हैं। अतः उत्तर की स्वयं ही खोज करें तो आपसे अधिक मुझे खुशी होगी। मेरा मानना है कि आपका जैसा उद्देश्य हो फल का अनुभव भी उसी के अनुरूप होता है। क्षमा चाहता हूँ, आपके उद्देश्य के कारण आपको निराश कर रहा हूँ।

vijay के द्वारा
July 27, 2012

dinesh ji apke sahyog ke liye dantevaad, satye ko hamara samaj itne aasani se swikar nahi karta


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